ओशो (Osho) आखिर इतना अधिक प्रसिद्ध क्यों हुए?

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ओशो (Osho) ऐसा नाम है जिसे सुनते ही मन भावुक हो जाता है आंखों से आंसू आने लगते है उनके विचार मन को छू जाते हैं और उनकी वाणी हमारे भीतर आनंद की लहर जगा देती हैं। ओशो (Osho) कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। ऐसी शख्सियत बहुत कम जन्म लेती है, जैसे हजारों साल में एक बुद्ध जन्म लेता है। 
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  ओशो (Osho) का असली नाम रजनीश चंद्र मोहन जैन था। उनका जन्म मध्यप्रदेश के कुचवाड़ा गांव में हुआ। उन्होंने जीवन के लगभग हर विषय पर खुलकर और स्पष्ट तरीके से अपने विचार रखे है। उनकी खास बात यह थी कि वे किसी धर्म के खिलाफ नहीं थे, बल्कि इंसान को उसकी नींद से जगाना चाहते थे। वे रूढ़ियों, अंधविश्वासों और पुराने जड़ विचारों को चुनौती देते थे। इसी वजह से कई लोगों को लगा कि वे धर्म पर हमला कर रहे हैं, जबकि सच्चाई यह थी कि वे धर्म नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर बनी गलत परंपराओं के खिलाफ थे। यही कारण रहा कि कई देशों ने उनके लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए।

ओशो और उनकी वाणी 

ओशो (Osho) कहते थे कि जीवन को जीने और परम सत्य को पाने के दो ही रास्ते हैं: प्रेम ध्यान उन्होंने ध्यान की 108 विधियों को सरल तरीके से समझाया। आधुनिक जीवन को देखते हुए उन्होंने डायनामिक मेडिटेशन जैसी नई ध्यान विधियाँ भी दीं, जो आज भी बहुत लोकप्रिय हैं।

ओशो का मानना था कि

“मैं न जन्मा हूँ, न मरा हूँ। मैं केवल कुछ समय के लिए इस धरती पर आया था।”

उन्होंने कहा कि Never Born, Never Died Only visited Earth (1931–1990)

ओशो (Osho) का ज्ञान इतना गहरा था कि बड़े-बड़े विद्वान उनके तर्कों के आगे चुप हो जाते थे।

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  अमेरिका में उन्होंने 64 हजार एकड़ में रजनीशपुरम बसाया। जब हजारों विदेशी उनके विचारों से प्रभावित होकर गेरुए वस्त्र पहनने लगे, तो पश्चिमी दुनिया चकित रह गई। ओशो (Osho) एक महान पाठक थे। उन्होंने अपने जीवन में लगभग डेढ़ लाख किताबें पढ़ीं। उन्होंने एक विशाल लाइब्रेरी बनाई, जिसका नाम था लाओत्सु पुस्तकालय। ओशो ने कहा था कि यह पुस्तकालय आम लोगों के लिए नहीं है, बल्कि शोध करने वालों के लिए है। ओशो (Osho) ने प्लेटो, अरस्तू, नीत्शे, फ्रायड, कबीर, नानक, बुद्ध, महावीर जैसे महान विचारकों को पढ़ा। उन्होंने अपनी पसंदीदा किताबों पर एक किताब लिखी - “Books I Have Loved”, जिसमें 160 सबसे प्रभावशाली किताबों का उल्लेख है।

हैरानी की बात यह है कि इतनी किताबों में से ओशो को हिंदी की केवल एक ही किताब सबसे ज्यादा पसंद आई — 👉 ‘नदी के द्वीप’ – अज्ञेय ओशो (Osho) ने इस उपन्यास की इतनी प्रशंसा की कि इसे टॉलस्टॉय और चेखव से भी श्रेष्ठ बताया। उन्होंने कहा कि यह किताब ध्यान करने वालों के लिए है और इसे शब्दों में समझाना मुश्किल है - इसे पढ़कर ही महसूस किया जा सकता है। इस उपन्यास में चार पात्र हैं -  भुवन, रेखा, चंद्रमाधव और गौरा ये सभी अपनी अधूरी इच्छाओं और रिश्तों के अर्थ को खोजते रहते हैं। किताब यह सिखाती है कि कभी-कभी दूरी में भी प्रेम की गहराई होती है। हर रिश्ता शारीरिक पास होने से ही सुंदर नहीं होता, बल्कि भावनात्मक समझ और स्वतंत्रता से ज्यादा सुंदर बनता है।

ओशो और उनकी बातों पर बहस 

जैसा कि हमने आपको बताया कि ओशो अपने प्रवचन हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में देते थे। वे अपने अनुयायियों से कहते थे कि प्रवचन सुनते समय आँखें बंद रखें, ताकि उनकी बात सीधे मन में उतर सके। ओशो (Osho) विवादित विषयों पर खुलकर बोलने के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी बातों पर अक्सर लोग बहस करते रहते है क्योंकि उनके विचार इतने अलग और साहसी होते थे कि कई बार भारत की संसद में भी उनके भाषणों पर प्रतिबंध लगाने की बात तक हुई। लेखक विन मैकॉरमक ने अपनी किताब ‘द रजनीश क्रोनिकल’ में लिखा है कि ओशो जानबूझकर अलग-अलग विषयों पर बात करते थे, ताकि हर तरह के लोग उनसे जुड़ सकें। उनके श्रोता हर उम्र, धर्म और देश से आते थे। 

जो भी व्यक्ति ओशो के संपर्क में आता था, वह या तो उनका शिष्य बन जाता था या उनका विरोधी - लेकिन कोई भी उनके प्रति उदासीन नहीं रह पाता था। सन् 1972 के बाद, भारत आने वाले विदेशी पर्यटक बड़ी संख्या में ओशो की ओर आकर्षित होने लगे। उस समय उनकी सचिव लक्ष्मी बहुत सावधानी से यह तय करती थीं कि कौन उनसे मिल सकता है। ओशो से मिलने से पहले लोगों को डायनामिक मेडिटेशन में भाग लेना पड़ता था, उसके बाद ही उनसे मुलाकात होती थी। शुरुआत में ओशो हर सुबह 6 बजे मुंबई के चौपाटी समुद्र तट पर प्रवचन देते थे। रात में वे कभी किसी हॉल में और कभी अपने घर पर लोगों को प्रवचन के लिए बुलाते थे।  

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